Hindi Compulsory Paper 2024

Hindi Compulsory Paper 2024

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Q1. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर 600 शब्दों में निबन्ध लिखिए: (10 Marks)
(a) लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
(b) क्या भारत में पेयजल संकट आसन्न है?
(c) जनजातीय संस्कृति का संरक्षण: प्रयास एवं संभावनाएँ
(d) थोथा चना बाजे घना

Q2. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उसके आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट, सही और संक्षिप्त भाषा में दीजिए: (12×5=6 Marks)
आलोचना साहित्य का एक अंग मानी जाती है, इसलिए कि वह साहित्य को अपनी सीमा के अन्दर रखने की व्यवस्था करती है। साहित्य में जब कोई ऐसी वस्तु सम्मिलित हो जाती है जो उसके रस प्रवाह में बाधक होती है, तो वहीं साहित्य में दोष का प्रवेश हो जाता है, उसी तरह जैसे संगीत में कोई बेसुरी ध्वनि उसे दूषित कर देती है।
हमारे सत्य भावों का प्रकाश ही आनन्द है। असत्य भावों में तो दुःख का ही अनुभव होता है। हो सकता है कि किसी व्यक्ति को असत्य भावों में भी आनन्द का अनुभव हो । हिंसा करके, या किसी के धन का अपहरण करके या अपने स्वार्थ के लिए किसी का अहित करके भी कुछ लोगों को आनन्द प्राप्त होता है; लेकिन यह मन की स्वाभाविक वृत्ति नहीं है। चोर को प्रकाश से अँधेरा कहीं अधिक प्रिय है, लेकिन इससे प्रकाश की श्रेष्ठता में कोई बाधा नहीं पड़ती ।
जिन भावों द्वारा हम अपने को दूसरों में मिला सकते हैं, वही सत्य भाव है। प्रेम हमें अन्य लोगों से मिलाता है, अहंकार पृथक् करता है। जिसमें अहंकार की मात्रा अधिक होती है वह दूसरों से कैसे मिलेगा ? अतएव प्रेम सत्य भाव है; अहंकार असत्य भाव है।
भक्ति करने के लिए किसी प्रत्यक्ष वस्तु की आवश्यकता है। दया करने के लिए भी किसी पात्र की आवश्यकता है। धैर्य और साहस के लिए भी हमें किसी सहारे की जरूरत है। तात्पर्य यह है कि हमारे भावों को जगाने के लिए उनका बाहर की वस्तुओं से सामंजस्य होना चाहिए । अगर बाह्य प्रकृति का हमारे ऊपर कोई असर न पड़े; अगर हम किसी को पुत्र-शोक में विलाप करते देखकर आँसू की चार बूँदें नहीं गिरा सकते; अगर हम किसी आनन्दोत्सव में मिलकर आनन्दित नहीं हो सकते; तो यह समझना चाहिए कि हम निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं। उस दशा के लिए साहित्य का कोई मूल्य नहीं। साहित्यकार तो वही सच्चा हो सकता है जो दुनिया के सुख-दुःख से सुखी या दुःखी हो सके और दूसरों में सुख या दुःख पैदा कर सके। स्वयं दुःख अनुभव कर लेना काफी नहीं है। कलाकार में उसे प्रकट करने का सामर्थ्य भी होना चाहिए। लेकिन भिन्न परिस्थितियाँ मनुष्य को भिन्न दिशाओं में डालती हैं। मनुष्य मात्र में भावों की समानता होते हुए भी, परिस्थितियों में भेद की वजह से प्रतिक्रिया में भेद पर असर पड़ता है। अगर हम किसानों में रहते हैं या हमें उनके साथ रहने के अवसर मिलते हैं, तो स्वभावतः हम उनके सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझने लगते हैं और उससे उसी मात्रा में प्रभावित होते हैं जितनी हमारे भावों में गहराई है। इसी तरह अन्य परिस्थितियों को भी समझना चाहिए। अगर इसका अर्थ यह लगाया जाए कि अमुक प्राणी किसानों का या मज़दूरों का या किसी आन्दोलन का प्रचार करता है, तो यह अन्याय है। साहित्य और प्रचार में क्या अन्तर है? प्रचार में अगर आत्मविज्ञापन न भी हो, तो एक विशेष उद्देश्य को पूरा करने की वह उत्सुकता होती है जो साधनों की परवाह नहीं करती । साहित्य शीतल, मन्द समीर है, जो सभी को शीतल और आनन्दित करती है। प्रचार आँधी है, जो हरे-भरे वृक्षों को उखाड़ फेंकती है और झोंपड़े तथा महल दोनों को ही हिला देती है। वह रस-विहीन होने के कारण आनन्द की वस्तु नहीं है, लेकिन यदि कोई चतुर कलाकार उसमें सौन्दर्य और रस भर सके, तो वह प्रचार की चीज़ न होकर सद्साहित्य की वस्तु बन जाती है ।
(a) आलोचना साहित्य का अंग क्यों है?
(b) सत्य और असत्य भाव से क्या आशय है?
(c) मन की स्वाभाविक वृत्ति क्या नहीं है?
(d) लेखक की दृष्टि में सच्चा साहित्यकार कौन हो सकता है?
(e) साहित्य और प्रचार में क्या अंतर है?

Q3. निम्नलिखित अनुच्छेद का सारांश लगभग एक-तिहाई शब्दों में लिखिए । इसका शीर्षक लिखने की आवश्यकता नहीं है। सारांश अपने शब्दों में ही लिखिए। (60 Marks)
यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मान से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ेगी या पड़ती होगी । अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाले किसी धनी को यूरोप के किसी धनी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को अंग्रेज़ी के किसी कवि को महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। सम्बन्धियों, बाल-सखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई एक सफल हो जाता है और किसी अच्छे पद पर पहुँच जाता है, तो प्रायः देखा जाता है कि वह दूसरे साथी को वैसा ही पद प्राप्त करने से रोकने का प्रयास करता है। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग-सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की सम्भावना प्रतिष्ठित होने के साथ-ही-साथ ईर्ष्या और द्वेष की सम्भावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई-ही-भलाई की सम्भावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें; यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिल्कुल हटा नहीं सकते ।
अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संसार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मान का गुप्त रूप से, बिना किसी समुदाय को विदित कराए; सुख या सन्तोष भोगने के लिए नहीं। ऐश्वर्य या गुण में हम चाहे किसी व्यक्ति से वस्तुतः बढ़कर या उसके तुल्य न हों, पर यदि समाज की यह धारणा है कि हम उससे बढ़कर या उसके तुल्य हैं तो हम संतुष्ट रहेंगे; ईर्ष्या का घोर कष्ट न उठाने जाएँगे । कैसी अनोखी बात है कि वस्तु-प्राप्ति से वंचित रहकर भी हम समाज की धारणा मात्र से संतुष्ट रहते हैं। ईर्ष्या सामाजिक जीवन की कृत्रिमता से उत्पन्न एक विष है। इसके प्रभाव से हम दूसरे की बढ़ती से अपनी कोई वास्तविक हानि न देखकर भी व्यर्थ दुःखी होते हैं। 
न्यायाधीश न्याय करता है; कारीगर ईंटें जोड़ता है। समाज कल्याण के विचार से न्यायाधीश का साधारण व्यवहार में कारीगर के प्रति यह प्रकट करना उचित नहीं है कि तुम हमसे छोटे हो। जिस समूह में इस 'छोटाई-बड़ाई' का अभिमान जगह-जगह जमकर दृढ़ हो जाता है, उसके भिन्न-भिन्न वर्गों के बीच स्थायी ईर्ष्या स्थापित हो जाती है, और संघ शक्ति का विकास बहुत कम अवसरों पर देखा जाता है। यदि समाज में कार्यों की, जिनके द्वारा भिन्न-भिन्न प्राणी जीवन-निर्वाह करते हैं, परस्पर छोटाई-बड़ाई का ढिंढोरा न पीटा जाए, बल्कि उनकी विभिन्नता ही स्वीकार की जाए; तो बहुत-सा असंतोष दूर हो जाए। जहाँ इस छोटाई-बड़ाई का भाव बहुत प्रचार पा जाता है और जीवन-व्यवहारों में निर्दिष्ट और स्पष्ट रूपों में दिखाई पड़ता है, वहाँ लोगों की शक्तियाँ केवल कुछ विशेष-विशेष स्थानों की ओर प्रवृत्त होकर उन-उन स्थानों पर इकट्ठी होने लगती हैं और समाज के कार्यविभागों में विषमता आ जाती है ।

Q4. निम्नलिखित गद्यांश का अंग्रेज़ी में अनुवाद कीजिए: (20 Marks)
कुटीर उद्योग या लघु उद्योग की चर्चा आज भारत में एक बार पुनः बल पकड़ रही है इस प्रकार के उद्योग-धंधों के मूल में ऐसे घरेलू किस्म के छोटे-छोटे काम-धंधों की परिकल्पना छिपी है, जिन्हें छोटे से स्थान पर थोड़ी पूँजी और श्रम से स्थापित कर कोई भी व्यक्ति उत्पादन का भागीदार बन अपनी रोजी-रोटी की समस्या हल कर सकता है; बेकारी से लड़कर सामान्य स्तर पर अपना जीवन जी सकता है। भारत जैसे देश के लिए इस प्रकार के छोटे उद्योग-धंधे ही हितकर हो सकते हैं; यह बात महात्मा गाँधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में ही जान ली थी। उन्होंने स्वतंत्र भारत में उसी प्रकार की इकाइयाँ स्थापित करने, परंपरागत उद्योगों का नवीनीकरण करने की प्रेरणा दी थी। पर स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद, नेतृत्व ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। बड़े-बड़े उद्योग-धंधे यहाँ पनपे और वह भी समर्थ लोगों की निजी संपत्ति बनकर रह गए। इधर बढ़ती जनसंख्या, शिक्षा का प्रचार, जागृति, अधिकारों की माँग और पहचान, बेकारों की निरंतर लंबी होती पंक्तियाँ इन सबने आज के जागरूक चिंतकों को विवश कर दिया है कि देर से ही सही, देश की इस प्रकार की बढ़ती समस्याओं से निपटने के लिए गाँधीवादी सूत्रों को अपनाएँ जो कि यहाँ की आवश्यकता - पूरी कर सकते हैं। परिणामस्वरूप आज देश में कुटीर उद्योगों का जाल-सा फैलने लगा है।

Q5. निम्नलिखित गद्यांश का हिन्दी में अनुवाद कीजिए: (20 Marks)
In our democratic system, the press has a vital role. While there has been large-scale expansion of the print and visual media in recent years, a focused approach to dealing with major societal and political issues has still to evolve. There is, as yet, excessive and exaggerated coverage of exposures and scandals and far too little well-informed comment or analysis of the various deep-rooted factors which generate the continuing malaise. The media could make an extremely useful contribution by devoting adequate coverage to tasks well done, highlighting the achievements of honest and efficient public servants and organizations, according special attention to developments in the remote and backward areas of our country. Our media is free and unfettered. It should be able to expose cases and incidents involving irregular and unlawful exercise of authority and abuses of all kinds. The existing ills in our socio-political environment will, on present reckoning, take considerable time to remedy. The Department of Personnel and Administrative Reforms should focus on establishing institutions responsible for all personnel matters appointments, postings, transfers etc. - without any external interference. Also, there is a need for adoption of a robust code of ethics to be followed by those involved in public functioning.

Q6. (a) निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए: (2×5=10 Marks)
(i) काग़जी घोड़े दौड़ाना
(ii) अपना उल्लू सीधा करना
(iii) लकीर का फ़क़ीर होना
(iv) चेहरे पर हवाइयाँ उड़ना
(v) गेहूँ के साथ घुन पिसना

(b)' निम्नलिखित वाक्यों के शुद्ध रूप लिखिए: (2x5=10 Marks)
(i) यह कविता अनेकों भावों को प्रकट करती है।
(ii) बाघ और बकरी एक घाट पानी पीती हैं।
(iii) यह काम आप पर निर्भर करता है ।
(iv) कई सौ वर्षों तक भारत के गले में पराधीनता की बेड़ियाँ पड़ी रहीं ।
(v) उस वन में प्रातःकाल के समय बहुत ही सुहावना दृश्य होता था ।

(c) निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची लिखिए: (2x5=10 Marks)
(i) कपड़ा 
(ii) सर्प 
(iii) वृक्ष 
(iv) यमुना
(v) अश्व 

(d) निम्नलिखित युग्मों को इस तरह से वाक्य में प्रयुक्त कीजिए कि उनका अर्थ एवं अंतर स्पष्ट हो जाए: (2x5=10 Marks)
(i) अलि - अली
(ii) कोष - कोश 
(iii) द्विप - द्वीप
(iv) भवन - भुवन
(v) श्वेत - स्वेद